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पश्चिमी यूपी में राजनीति का केंद्र बना सहारनपुर, राजनीतिक समीकरणों को साधने की हो रही कोशिश

उत्तर प्रदेश में चुनावी सरगर्मियां लगातार तेज होती जा रही है। जैसे जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आ रहे हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हलचल पर बढ़ती जा रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में सहारनपुर अब केंद्र बनता जा रहा है। हालांकि सहारनपुर इस बात का भी साक्षी बन रहा है कि पूर्व मंत्री धर्म सिंह सैनी के साथ-साथ कई नेताओं ने दल बदले हैं। सहारनपुर के नाकुर से विधायक और योगी सरकार में मंत्री रहे धर्म सिंह सैनी ने समाजवादी पार्टी में शामिल होना जायज समझा। वहीं इमरान मसूद भी अखिलेश यादव के साथ हो चुके हैं।
 
 
यह जानना भी बेहद दिलचस्प है कि धर्म सिंह सैनी ने दो बार इमरान मसूद को हराकर ही विधायक बने हैं। 2012 में धर्म सिंह सैनी ने बसपा की टिकट पर इमरान मसूद को हराया था जबकि 2017 में भाजपा की टिकट पर। इससे पहले धर्म सिंह सैनी सहारनपुर की सरसावा विधानसभा सीट से भी दो बार विधानसभा का चुनाव जीत चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सैनी अच्छी खासी संख्या में हैं। माना जा रहा है कि धर्म सिंह सैनी का प्रभाव लगभग 15 विधानसभा क्षेत्रों में है जिसमें शामली, सहारनपुर, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर और नोएडा शामिल है।
 
 
अब सवाल यह है कि आखिर धर्म सिंह सैनी के पाला बदलने से भाजपा को कितना नुकसान होगा? जाहिर सी बात है इस को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने फिलहाल नाकुर से मुकेश चौधरी को टिकट दिया है जबकि बेहट से नरेश सैनी को चुनावी मैदान में उतारा है। भाजपा ने 107 सूची में से 44 ओबीसी उम्मीदवार उतारे हैं जबकि 19 एससी वर्ग के उम्मीदवार उतारे हैं। भाजपा उत्तर प्रदेश चुनाव में ओबीसी वोट बैंक पर पूरी तरह से फोकस कर रही है और यही कारण है कि धर्म सिंह सैनी जैसे नेताओं के पलायन होने वाले नुकसान को कम करने के लिए भाजपा ओबीसी चेहरे को आगे कर रही है।
 
 
माना जा रहा है कि फिलहाल सैनी और मसूद दोनों ही समाजवादी पार्टी में चले गए हैं। ऐसे में अगर सैनी नाकुर से चुनाव मैदान में उतरते हैं तो मसूद को बेहट भेजा जा सकता है। भाजपा ने जिस नरेश सैनी को उम्मीदवार बनाया है वह कांग्रेस से ही भाजपा में शामिल हुए हैं। सैनी पिछड़े वर्ग से हैं और कहा जाता है कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र में काफी लोकप्रिय हैं। देखना दिलचस्प होगा कि सहारनपुर इस साल की राजनीति में किस करवट जाता है। लेकिन यह बात तो तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश का रोल काफी बढ़ गया है। 
 

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