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पूर्वोत्तर में भाजपा ने दी पहली स्थिर सरकार, 5 साल तक शांत रहे मणिपुर में चुनाव से पहले बढ़ी सरगर्मी

पूर्वोत्तर में भाजपा ने दी पहली स्थिर सरकार, 5 साल तक शांत रहे मणिपुर में चुनाव से पहले बढ़ी सरगर्मी

इम्फाल। मणिपुर में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाला है। ऐसे में यहां पर राजनीतिक दल मतदाताओं को अपने पाले में करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। पहले के विधानसभा चुनाव की तरफ देखें तो यहां पर कई दलों के बीच मुकाबला होता था लेकिन इस बार का मुख्य मुकाबला भाजपा, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच देखने को मिलेगा। साल 2017 के चुनाव से पहले भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह ने एन बीरेन सिंह को अपने पाले में कर लिया था। जिसकी वजह से मणिपुर जैसे राज्य में भाजपा मजबूत हुई और 2017 के चुनाव में कमाल भी की। हालांकि पार्टी प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, इसके बावजूद एन बीरेन सिंह के दम पर भाजपा ने यहां पर सरकार बनाई। 

इतना ही नहीं भाजपा ने साल 2017 के चुनाव में घाटी और पहाड़ी लोगों के बीच में पार्टी को लेकर चल रही धारणाओं को भी बदला और कांग्रेस सरकार के खिलाफ चल रही एंटी इंकमबेंसी का फायदा भी उठाया। आपको बता दें कि 60 सदस्यीय विधानसभा की 20 सीटें पहाड़ी इलाकों में और 40 सीटें घाटी इलाकों में हैं। इसके अलावा प्रदेश की राजनीति में हमेशा मेतई समुदाय का ही दबदबा देखने को मिलता रहा है और यहां की 63 फीसदी जनसंख्या मेतई है और पूर्व मुख्यमंत्री इबोबी सिंह और मौजूद मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भी इसी समुदाय से आते हैं। इसी बीच मणिपुर के कुछ विशेष राजनीतिक दलों पर एक नजर डाल लेते हैं।

भाजपा

मणिपुर में इस समय पहली भाजपा सरकार है और इसका गठन करने के लिए कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए एन बीरेन सिंह ने अहम भूमिका निभाई थी, जो इस वक्त प्रदेश के मुखिया हैं। प्रदेश में एन बीरेन सिंह की सरकार ने विकास के कार्यों के साथ-साथ शांति भी स्थापित की। वरना पहले यहां पर हड़तालें इत्यादि चलती रहती थीं। केंद्र की मोदी सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना में पूर्वोत्तर पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया है। इतना ही नहीं भाजपा पूर्वोत्तर को भारत का विकास द्वार भी मानती है। हालांकि भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या अफ्सपा के रूप में रहने वाली है क्योंकि यहां की जनता अफ्सपा से परेशान है और वो भाजपा नेताओं से इसको लेकर जरूर सवाल पूछेगी।

असम और अरुणाचल प्रदेश में सरकार बनाने वाली भाजपा मणिपुर में भी अपनी सरकार का गठन करना चाहती थी। ऐसे में पार्टी को एक दमदार नेता की आवश्यकता थी, जो इबोबी सिंह को परास्त कर सके। ऐसे में भाजपा की तलाश एन बीरेन सिंह पर आकर समाप्त हुई। क्योंकि एन बीरेन सिंह ही एकमात्र नेता थे, जो इबोबी सिंह के संकटमोचक रहे थे और फिर उन पर सवाल भी खड़ा किया था। इतना ही नहीं कांग्रेस इबोबी सिंह और एन बीरेन सिंह के बीच के मतभेद को भी समाप्त करना चाहती थी। इसीलिए एन बीरेन सिंह को उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया था। इसके बाद भी विवाद समाप्त नहीं हुआ और मुख्यमंत्री से चल रहे मतभेदों के बीच एन बीरेन सिंह ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। 

राजनीतिक गलियारों में एन बीरेन सिंह को मणिपुर का हेमंत बिस्वा सरमा माना जाता है, क्योंकि दोनों ही कांग्रेस में रहते हुए संकटमोचक रहे हैं और फिर भाजपा में आने के बाद प्रदेश के मुखिया बने।

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 21 सीटें मिली थी। इसके बावजूद पार्टी ने एनपीएफ, एनपीपी और कुछ सहयोगी दलों की मदद से न सिर्फ सरकार का गठन किया बल्कि पांच वर्षों तक आराम से सरकार भी चलाई। ऐसे में यदि अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा अपनी सत्ता बचा पाने में कामयाब होती है तो एन बीरेन सिंह पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हो जाएंगे।

कांग्रेस

1963 में पहली बार मणिपुर में विधानसभा के चुनाव हुए। पहले ही चुनाव में यहां कांग्रेस की जीत हुई और मैरेम्बम कोइरंग सिंह मुख्यमंत्री बने। सबसे ज्यादा प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें रही हैं। मणिपुर को साल 1972 में राज्य का दर्जा मिला था। इसके बाद वहां पर साल 2002 तक राजनीतिक उथल-पुथल बहुत ज्यादा देखने को मिली और 18 सरकारें बदल गईं। इन अस्थिर सरकारों में कांग्रेस, मणिपुर यूनाइटेड फ्रंट, मणिपुर पीपल्स पार्टी, मणिपुर हिल्स यूनियन, जनता पार्टी, मणिपुर स्टेट कांग्रेस पार्टी, समता पार्टी की सरकारें रहीं। ऐसे में कांग्रेस एक स्थिर सरकार बनाना चाहती थी। इसके लिए पार्टी ने साल 2002 में इबोबी सिंह को अपना कप्तान चुना था। ऐसे में उन्हें एक वफादार संकटमोचक की तलाश थी और उनकी तलाश पहली बार चुनाव लड़ रहे एन बीरेन सिंह पर आकर समाप्त हुई। 

उस वक्त एन बीरेन सिंह ने डेमोक्रेटिक रिवॉल्यूशनरी पीपल्स पार्टी से चुनाव लड़ा था और हेइंगांग क्षेत्र से विधायक बने थे। जिसके बाद इबोबी सिंह ने एन बीरेन सिंह को कांग्रेस में शामिल करा लिया था और अपने मंत्रिमंडल में जगह दी। इसी प्रकार उनके दो कार्यकाल पूरे हो गए लेकिन तीसरे कार्यकाल के दौरान इबोबी सिंह और एन बीरेन सिंह के बीच मतभेद भी शुरू हो गया। इसके अलावा इबोबी सिंह ने उन्हें मंत्रिमंडल में जगह भी नहीं दी और फिर वो नाराज होकर कांग्रेस छोड़कर चले गए।

इसके बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन साल 2017 में बढ़िया था। उस वक्त पार्टी 28 सीटें जीतने के साथ ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन सरकार बना पाने में कामयाब नहीं हो पाई। हालांकि इस बार का मुकाबला भी कांग्रेस के लिए चुनौतियों से भरा रहने वाला है।

तृणमूल कांग्रेस

आगामी विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस मणिपुर में खुद की पैठ जमाने में जुटी हुई है। इसके लिए वो दूसरे दलों के नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कराने की कोशिशों में जुटी हुई है। टीएमसी इस बार अपनी पूरी ताकत के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने वाली है। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 7 सीटों पर जीत मिली थी। हालांकि बाद में टीएमसी के विधायक कांग्रेस और भाजपा में शामिल हो गए थे। इसके अलावा पिछले चुनाव में पार्टी एक सीट ही जीत पाई थी।

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