सभी धर्मों का सम्मान, डरा हुआ नहीं है मुसलमान, भारत के धार्मिक सहिष्‍णुता की बात बताते प्यू रिसर्च की बड़ी बातें

जब जीरो दिया था भारत ने दुनिया को तब गिनती आई..सभ्यता जहां पहले आई, जहां जन्मी पहले थी कला…. हिंदुस्तान के प्रीत की रीत और दिल में बसे प्रेम को बयां करते हुए भारत का रहने वाला कुछ इस तरह भारत की बात बताया करता है। भारत अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए जाना जाता है। लेकिन अपनी राजनीतिक जमीन बनाने के लिए अक्सर कुछ लोग भारत को असहिष्णु करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सहिष्णुता भारत की सांस्कृति है। भारत से ज्यादा सहिष्णु मुल्क पूरी दुनिया में कोई नहीं है। सेक्युरिज्म, धार्मिक आजादी और स्वतंत्रता भारत की मूल पहचान है। पूरी दुनिया में भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों, धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक आजादी की मिसाल दी जाती है। लेकिन आए दिन कई सालों से आपने देखा होगा कि भारत को बदनाम करने की कोशिश की गई। कभी सीट के मामले को बीफ का मामला बताकर तो कभी गाजियाबाद के ताबीज मामले को जय श्री राम का मामला बताकर ये दिखाने की कोशिश की मुसलमान डरा हुआ है। सीएए जिसका भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं है। उनसे डरो ट्रिपल तलाक से डरो। ऐसी कई सारी चीजें पिछले कई सालों से चल रही थीं। लेकिन एक रिपोर्ट आई है भारत को वक्त वक्त पर असहनशील साबित करने की कोशिश करने वालों की मुंह पर ताला लग जाएगा। अमेरिकी एजेंसी ने जो सर्वे किया है उसके आंकड़े विरोधियों को करारा जवाब देने के लिए काफी है। बहुत पुरानी कहावत है खबर वही है जिसे दबाया या छुपाया जाए, बाकी सब तो विज्ञापन है। आज हम आपको ऐसी ही खबर के बारे में बताएंगे जो बाकी खबरों के नीचे दबकर रह गई। ये रिपोर्ट न तो वायरल हुई न ही इसके बारे में कोई बातचीत हुई औऱ सोशल मीडिया पर न ही ट्रेंड करती दिखी। जिसके पीछे की वजह है कि ये रिसर्च कहती है कि भारत में आज भी धार्मिक सौहार्द का माहौल बना हुआ है। अगर ये रिसर्च कहती कि भारत में धार्मिक सहिष्णुता नहीं है और भारत में अहसनशीलता फैल रही है तो शायद ये रिसर्च अबतक वायरल होकर टॉप ट्रेंड में होती और हमारे देश का एक वर्ग कॉफी के एक प्याले के साथ अखबार लिए देश के लोकतंत्र को खतरे में बता रहा होता। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 

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क्या कहती है रिपोर्ट
अमेरिकी रिसर्च सेंटर ने धार्मिक आधार पर भारत के 26 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में सर्वे किया। इस सर्वे में 17 भाषाएं बोलने वाले 30 हजार लोगों को शामिल किया था और जो नतीजे सामने आए हैं उसके मुताबिक भारतीयों का सभी धर्मों के सम्मान में पूरा विश्वास है। भारत ऐसा देश है जहां कई धर्मों के अनुयायी रह सकते हैं। किसी भी धर्म का अनुयायी आजादी से उपासना कर सकता है। सर्वे में धर्म के आधार पर भी लोगों की मानसिकता का आंकलन किया गया। इस बारे में भी लोगों के सोच काफी स्पष्ट नजर आएं।
कितने लोगों को लगता है कि उन्हें अपने धर्म के पालन की स्वतंत्रता है?
91% हिन्दुओं को लगता है कि उन्हें अपने धर्म के पालन की स्वतंत्रता है।
89% मुस्लिम धर्म का पालन करने के लिए खुद को स्वतंत्र मानते हैं। 
89 % ईसाई को लगता है कि उन्हें भारत में अपने धर्म के पालन की स्वतंत्रता है। 
82%  सिख धर्म का पालन करने के लिए खुद को स्वतंत्र मानते हैं। 
93 % बौद्ध को लगता है कि उन्हें अपने धर्म के पालन की स्वतंत्रता है।
85 % जैन धर्म का पालन करने के लिए खुद को स्वतंत्र मानते हैं। 
सभी धर्मों का सम्मान करना भारतीयों की पहचान
 85 % हिन्दुओं का मानना है कि एक सच्चे भारतीयों की पहचान है कि वो सभी धर्मों का सम्मान करे।
 78 % मुसलमानों का मानना है कि सभी धर्मों का सम्मान करना भारतीयों की पहचान है।

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खान-पान भी भारतीयों के पहचान को प्रभावित करता है?
49% लोग मानते हैं भगवान में विश्वास नहीं रखने वाले और मंदिर नहीं जाने वाले हिन्दू नहीं हैं।
60% मुसलमान मानते हैं कि अल्लाह को न मानने वाले, मस्जिद नहीं जाने वाले मुसलमान नहीं। 
शादी और धर्म पर क्या कहना है?
67% हिंदू मानते हैं कि हिंदू महिलाओं को दूसरे धर्म में शादी करने से रोका जाए।
65% हिंदू मानते हैं कि हिंदू पुरूषों को भी दूसरे धर्म में शादी नहीं करनी चाहिए।
80% % मुसलमान मानते हैं कि मुस्लिम महिलाओं को दूसरे धर्म में शादी करने की मनाही हो।
76% % मुसलमान का मानना है कि मुस्लिम पुरूषों को भी दूसरे धर्म में शादी नहीं करनी चाहिए।
लोग दूसरे समुदायों के लोगों से यारी-दोस्ती कायम करने में दिलचस्पी नहीं दिखाते
86 % हिंदुओं ने बताया कि उनके सभी या अधिकतर करीबी दोस्त हिंदू ही हैं।
 89 % मुसलमानों ने कहा कि उनके अधिकतर करीबी दोस्त मुसलमान हैं। 
ईसाइयों में ऐसे लोगों का आंकड़ा 78 % का रहा।
सिखों में 81 % रहा।
अधिकतर करीबी दोस्त अपनी जाति के ही होने की जानकारी दी 69 फीसदी हिंदुओं ने। मुसलमानों में 76 फीसदी, ईसाइयों में 64 फीसदी लोगों ने अपनी जाति के ही दोस्त बनाए हैं। सिखों में यह आंकड़ा मुसलमानों के बाद सबसे ज्यादा 74 फीसदी रहा।
 सर्वे में 69% लोगों एससी / एसटी/ओबीसी-एमबीसी
सर्वे में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो खुद को ओबीसी, एससी और एसटी बताया है। ऐसे में यह ओबीसी से जुड़े उन नेताओं के मांग का समर्थन करती है जो दसवी जनगणना में ओबीसी से आंकड़े को अलग से पेश किए जाने की मांग करते हैं। प्यू सर्वेक्षण में 69% लोगों ने खुद को एससी / एसटी/ओबीसी-एमबीसी के रूप में बताया। इनमें से कॉलेज ग्रेजुएट्स की संख्या 56% थी। जाति के बावजूद, पूरा भारत आर्थिक सुधार चाहता है। सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश लोगों को, काल्पनिक रूप से, अन्य धर्मों के पड़ोसियों के लिए कोई आरक्षण नहीं था।

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